Face-to-face

Conversations about mamta

In the previous blogpost, we examined shades of mamta, the popular emotion of ‘mother’s love’ in many Indian languages, its origins and many meanings. For those of you who missed it, you can return to the discussion here: https://masalachaimusings.com/2017/12/01/she-loves-me-she-loves-me-not/

This week, we provide you with an unfiltered, intimate conversation between the same child (now also a grandmother herself) and her mother (now also a great-grandmother) in a discussion about mamta. The conversation is placed before you without any references to patriarchy, feminism, culture, tradition, essentialism, linguistic analysis, in fact without any particular position. It is our fear that we have become far too sensitive and judgmental about people’s words, and are losing the capacity for generously and genuinely listening to others. Newspapers are replete with heated arguments about who said what and why and how and debates about meanings and messages have begun to border on the ridiculous. So, dear readers, please leave aside your alignments with any ideology you may cling on to (that too is important) for the moments when you read through what is being said by the matriarch, the apparent simplicity of the word and its the unfolding complexity is what we attempt to present here. Briefly, we can see how the conversation develops between love as sacrificing, unselfish in abstract terms but with elements of selfishness, as calm as it is caring, physiological or natural as well as eternal. Some distance is discernible between the abstract and ideological notion of mamta and its many shades in the lives of ordinary people. We welcome you to this conversation with a deep sense of gratitude to Indu’s mother, sister and her. Indu’s mother responds even though at the outset, she even says she’s not yet ready to have the conversation!

In order to preserve the flow of the transcript, we provide you with the English translation only at the end of the post and not alongside.

Conversations:

Indu’s mother:

इंदु: चलिए माताजी, हम आप से कुछ बातचीत करेंगे, तैयार है आप?
माता: अभी नहीं तैयार हूँ मैं
इंदु: चलो कोई बात नहीं ना तैयार हो पर जो आपके मन मे आये आप उस का जवाब दे सकते हो ठीक है?
माता: ह्म म म म
इंदु: तो आप ये बताओ कि आप के विचार से ममता शब्द का क्या अर्थ है?
माता: ममता शब्द का मतलब ही (ठहराव) मन का प्यार, आतंरिक प्यार (ठहराव)
इंदु: (जांच करते हुए) तो आंतरिक प्यार तो ये विशेषकर मन के लिए क्यों यूज़ किया जाता है, स्तेमाल किया जाता
है? किसी और के लिए भी कर सकते है हम ममता शब्द का इस्तेमाल?
माता: माँ की ममता एक वो प्रसिद्ध हो गया है वो कहावत जैसे…………
इंदु: हममममममम
माता: और वैसे करो तो ममता सब से हो जाती है नौकरो से भी ममता हो जाती है I
इंदु: अच्छा, तो आंतरिक शब्द से आपका क्या मतलब है?
माता: आंतरिक शब्द से अंदर का, हृदय का प्यार।
इंदु: तो ऐसे हृदय का प्यार और प्यार से कैसे अलग है?
माता: और प्यार से ऐसे अलग है कि और प्यार मे थोड़ा बहुत स्वार्थ होता है।
इंदु: अच्छा
माता: इस प्यार में स्वार्थ नहीं होता।
इंदु: अच्छा

इंदु: अधिकतर हमने माता शब्द का प्रयोग माँ के सन्दर्भ में सुना है?
माता: हाँ
इंदु: तो ये ऐसा क्यों ?
माता: क्योंकि माँ जो है अँधा प्यार करती है औलाद से। वो किसी किसी वक़्त वो उसकी गलती भी देख कर वो गलत
नहीं मानती।
इंदु: अच्छा
माता: हाँ
माता: बचपन में तो, माँ का भई वो, पालन पोषण की वजह से ममता ज़्यादा कही जाती है कि वो तकलीफ उठाती है,
रातो को जागती है। … अअअ अपना सब कुछ अर्पण करती है औलाद के ऊपर। बड़ा हो जाता है तो …… हलाकि बच्चे
धीरे धीरे अलग होने लगते है। लेकिन माँ वही……. चाहे उस का बच्चा ६० साल का हो जाये पर उस को फिर भी बच्चा
ही दिखाई देता है।
इंदु: अच्छा, तो जैसे अभी आपने बोला कि माँ का प्यार अँधा प्यार होता है तो क्या निस्वार्थ प्यार और
अँधा प्यार एक ही बात है?
माता: निस्वार्थ प्यार ……… माँ का प्यार अगर देखा जाये तो एक्चुअली में तो निस्वार्थ माँ का भी नहीं
है थोड़ा बहुत तो उस में भी स्वार्थ है कि भाई बड़ा हो कर हमारी मदद करेगा I हमारा बुढ़ापा कटेगा
इसकी बदोलत I
इंदु: हममममम
माता: लेकिन ममता ममता ही होती है ममता कुछ नहीं देखती। वो तो बस ये देखती है कि मेरा बच्चा
आया घर में, उसने खाया या नहीं खाया।
इंदु: अच्छा चलो ये बताओ कि इतनी उम्र गुज़ारी है आपने, आप माँ भी बनी, दादी बनी, परदादी बनी,
परनानी बनी, तो आप ने अपने पूरे समय में माँ की ममता में कोई परिवर्तन देखा है क्या? आप के
समय की जो मदर्स थी और आज के ज़माने की जो मदर्स, माँए है उन में कोई परिवर्तन देखा है क्या?
माता: परिवर्तन तो पहले की माँओ में और अब की माँओ में बहुत है। पहले की माँए बच्चो पर कब
ध्यान दे पाती थी? कई कई बच्चे होते थे एक के बाद एक तो उनका…… हालांकि उनकी तकलीफ,

आराम में परेशान हो जाती थी, परेशान हो जाती थी किसी का भी हो, लेकिन इतना कहाँ…… आज कल
की माँए तो बच्चो की तरफ पूरा धयान देती है बहुत करती है उनका पढ़ाना लिखाना और समय भी
देना, पहले इतना समय कहाँ दिया जाता था माँ बच्चो को?
इंदु: अच्छा तो क्या समय देना और ममता होना या ना होना एक ही बात है? मतलब आप क्या ये
कहेंगी की समय नहीं देती तो ममता में कमी है?
माता: ममता में कमी नहीं होती है, ममता तो वहीँ होती है। ज़रा सा भी कोई भी बच्चा हो, बड़ा हो चाहे
छोटा हो, कई कई बच्चे होते थे पहले माँओ के, तो ये थोड़ा है कि उन में फर्क किया जाए था? लेकिन
अब ममता तो अंदरूनी प्यार है, पिता का जो कहा जाये पिता का फ़र्ज़ वाला प्यार होता है। उस को
हमेशा ये है के बच्चे को पढ़ाना है लिखाना है। बच्चे को बड़ा बनाना है। आज कल की माँए खुद सोचने
लगी है ये बातें। पहले की माँए ये नहीं सोचती थी.
इंदु: अच्छा तो आप ये कहना चाहती है कि जो ममता है माँ है वो केवल बच्चे को प्यार देती है और
पिता उस के जीवन के बारे में भी सोचता है, और आज की माँए ये भी सोचने लगी है?
माता: आज की माँए सोचने लगी है। पहले की माँए कहाँ सोचती थी ये बात?
इंदु: तो क्या ममता शब्द का इस्तेमाल अगर तो ममता एक अंदरूनी प्यार है तो ये क्या पिता के सन्दर्भ
में नहीं किया जा सकता, पिता की ममता नहीं होती है क्या?
माता: पिता को भी ममता होती है, क्यों नहीं होती?
इंदु; तो हमने कभी सुना क्यों नहीं कि पिता की ममता?
माता: अरे वो माँ की ममता का क मुहावरा सा बन गया है जैसे, ऐसे ममता है उसे जैसे माँ को होये
…… कोई हर एक के लिए कह दिया जाता है । पिता की ममता क्यों नहीं होती? …… बहुत से पिता
ऐसे होते है कि जो माँ मर जाती है तो बच्चो को किस तरीके से पालते है पालने में अपना सारा जीवन
अर्पण कर देते है। शादी ब्याह भी नहीं करते। दूसरा बच्चो की वजह से बहुत से बाप ऐसे होते है।
इंदु: तो ऐसे प्यार को जो अपने जीवन को अर्पण कर दे उसे ममता कहेंगे? चाहे वो पिता के द्वारा हो
या माँ के द्वारा?
माता: बिल्कुल
इंदु: तो वो किसी बुआ, चाची, किसी आया. ..किसी से भी हो सकता है?

माता: मेरे क्ययाल में तो हो सकता है। अगर किसी ने सच्चे मन से किसी को पाला है तो उसे वही
ममता कहेंगे। जैसे किसी माँ ने बच्चा गोद लिया है तो क्या उसे ममता नहीं होती?
इंदु: चलिए, धन्यवाद।

Between sisters

इंदु : हाँ जी रश्मि जी
रश्मि: हाँ जी
इंदु: आप से कुछ सवाल पूछना चाहते है हम
रश्मि: हाँ जी ज़रूर पूछिए
इंदु: तो ममता शब्द सुना है आपने?
रश्मि: हाँ जी सुना है।
इंदु: आपके विचार से इस शब्द का क्या अर्थ है?
रश्मि: ममता शब्द अअअअअअ ….. हमेशा माँ की ममता के हिसाब से ही इस्तेमाल किया जाता है ये
शब्द। और ममता का मतलब प्यार, निस्वार्थ प्यार और ममता शब्द ही माँ से बना है, म-अ -म- त -आ
– मतलब माँ का प्यार। इसलिए सब से ज़्यादा माँ के प्यार को मानते है क्योंकि माँ का प्यार बहुत ही
निश्छल, निस्वार्थ होता है।
इंदु: तो आप बोल रही हैं कि ममता शब्द बना है माँ से ही इसकी की उत्पत्ति माँ से हुई है आप के
विचार से?
रश्मि: हाँ ये मेरे विचार से है।
इंदु: तो हम ये शब्द किसी और के संदर्भ से नहीं इस्तेमाल कर सकते है क्या?
रश्मि: नहीं, निस्वार्थ प्यार जो भी इंसान करे चाहे वो अपने बच्चे से हो चाहे अपने आस पास रहने वाले
किसी भी व्यक्ति से हो, व्यक्ति से हो या जानवर से भी हो वो भी ममता की तरह से हो सकता है
अगर वो निस्वार्थ है तो।
इंदु: निस्वार्थ से क्या मतलब है?
रश्मि: मतलब जिससे हमे किसी तरह की उम्मीद ना हो कि इस के बदले हमे कुछ मिलेगा इससे।
बिल्कुल कि जिस में देना ज़्यादा होता है, इस में लेने की उम्मीद कम होती है।

इंदु: तो क्या ममता शब्द का उपयोग हम पिता के संदर्भ में कर सकते है?
रश्मि: पिता के संदर्भ में भी। …… ममता का प्रयोग किया जा सकता है यदि पिता इस भाँती से कहे की
भई आम तौर पर आदमी जो होते है जो मैन और जो वूमेन होते है उन की प्रकृति अलग होती है।
पिता जो होता है वो कर्त्तव्य बाउंड ज़्यदा होता है। या…… आ….. प्रैक्टिकल जिसे कहते है ना उनकी
अप्प्रोच वो ज़्यादा होती है बच्चो की तरफ और माँ की जो अप्प्रोच होती है वो प्यार भरी और कुछ पढ़ाने
सीखाने वाली अप्प्रोच ज़्यादा होती है।
इंदु: तो इस शब्द का प्रयोग हम पिता के लिए सकते है?
रश्मि: पिता के लिए अगर पिता का प्रैक्टिकल के साथ साथ निस्वार्थ प्रेम भी होगा तो बिलकुल करा जा
सकता है। जैसे बहुत सारे पिता होते है जो अकेले पिता रह गए मगर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी अपने
बच्चो के लिए बिता दी और बिल्कुल तभी भी हम इस्तमाल ये ही करते है कि माँ की तरह से उस बाप
ने अपने बच्चे को पाला I
इंदु: अच्छा, तो भी उसका प्यार माँ कि नज़र से, माँ……. माँ
रश्मि: शायद इस वजह से की माँ अपने बच्चे को पैदा करती है, पहले ९ महीने अपने गर्भ में रखती है,
फिर उस के लिए पूरी तकलीफ उठती है और उस दर्द में भी खुश होती है। कभी ९ महीने की बच्चे को
कैर्री करने की तकलीफ होती है उस तकलीफ को भी वो तकलीफ नहीं मानती और जो बच्चे को पैदा
करने के दर्द होते है जिस को हम कहते है कि उससे बड़ा कोई दर्द नहीं है सबसे बड़ी तकलीफ है वो और
तो उस समय भी माँ के चेहरे पर कोई शिकन नहीं होता तो वो अपने आने वाले बच्चे के इंतज़ार में सब
कुछ भूल जाती है। और जैसे ही वो बच्चा उस की गोद में आता है तो उस का नजरिया ही कुछ और
होता है बिल्कुल …… तो शायद इसलिए माँ के प्यार को सबसे ऊँचा मानते हुए माँ के लिए ममता शब्द
ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

इंदु: और आपने इसके विषय में कहीं कुछ पढ़ा हो? ममता शब्द का कहीं कुछ ज़िक्र आया हो? आपको
पढ़ने क इतना शौक है तो कहीं कुछ पढ़ा हो तो शेयर कीजिये।
रश्मि: जब भी माँ के बारे में सोचो तो एक कहानी या पुराना मुहावरा याद आता है कि माँ की ममता
ऐसी है कि बच्चा अगर उसे मार कर भी डाल दे और उसकी हड्डी ज़मीन में पड़ी हो और बच्चा उस

हड्डी से ठोकर खा जाये तो माँ की हड्डी से आवाज़ आती है कि – बेटा तुझे चोट तो नहीं लगी? ‘ ये
ज़रूर मेने सुना है सबसे ज़्यादा। हमेशा ये उदहारण आता है कि माँ का प्यार ऐसा होता है।
इंदु: कि उसे कितने भी दुःख दे औलाद माँ फिर भी उसे प्यार करना नहीं छोड़ती । अच्छा तो ममता
क्या अपनी औलाद के प्रति ही हो सकती है?
रश्मि: ममता, ये मैंने अभी पहले भी बोला की ममता किसी से भी हो सकती है जो हमारे साथ रह रहा
हो, चाहे वो इंसान हो या चाहे वो जानवर हो? जानवर से भी ऐसी ममता हो सकती है तभी भी उदहारण
यही दिया जाता है कि अपने बच्चे जैसे प्यार करते हो तुम इस को. हर जगह बात घूम फिर कर के
बात माँ और बच्चे के रिश्ते पर ही आ जाती है।
इंदु: तो अगर में आपसे कहूँ कि आप के विचार से ममता शब्द की उत्पत्ति माँ का प्यार अपने बच्चे के
प्रति है उससे बना है ये शब्द, सही है क्या?
रश्मि: मेरे हिसाब से हाँ।
इंदु: अच्छा धन्यवाद जी।

Translation:

I: Indu, M: Mother, R: Sister

I – Okay Mataji, are you ready for some chit-chat? M – I’m not yet ready…..

I – Never mind, but maybe you can just talk about what you have in mind? M – hmmm…

I – So tell me, in your opinion, what is the meaning of the word ‘mamta’?

M – The word mamta means………love of the mind, internal love……….

I – (Probing) So, this internal love, why is this specifically used for mother? Can we use it for someone else?

M – This….mother’s love………it has become popular………like a proverb.

I – Hmm. And….like…can mamta happen with anyone? Can we feel mamta for anyone (other than your own child?)

M – Why not? Of course it can.

I – And…..what is meant by the expression ‘internal’?

M – By internal, it is meant from inside, from the heart.

I – So how is this love from the heart, how is it different from regular love?

M – How it is different from regular love is that regular love has a bit of selfishness.

I – Okay….

M – (In love [mamta love]……… there is no selfishness.

I – Okay………….mostly we have heard the term mamta used with reference to the mother, right?

M – Yes.

I – So why is that?

M – This is because a mother’s love for her child is blind. Sometimes, sometimes, she can even look at a fault [of her child] and doesn’t treat it as a fault.

I – Okay.

M – In childhood, the caring, nurturing, because of that it is said that mamta is more….she takes pains, wakes at night, offers everything she has on her offspring. When [the child] grows, there is a gradual slow separation, but the mother……her child may be 60 years old…..but she sees only her child.

I – Okay, you just said that a mother’s love is blind, so do you mean that it is unselfish? Selfless? Is that the same thing?

M – Unselfish love, if you see……..actually…..a mother’s love is also not really completely unselfish, it has some element of selfishness that when we grow old, this child will take care of us……our old age will proceed peacefully with this child (caring for us).

I – Hmm…..

M – But….mamta is mamta……..mamta does not see anything…….that….that just looks at….my child…has returned home…has (he/she) eaten or not?…………[fades]

I – Okay, so you tell [us] that everyone says that you have lived so many years now……you became a mother, a grandmother, now a great-grandmother, over this time period, have you seen any changes in mamta? From the mothers of your time to the mothers of today? Have you seen any changes?

M –There is a lot of change between mothers of earlier times and today’s mothers. Earlier where could mothers spend so much time with their children? There were many children….one after another…..and their……although she would get upset over their troubles/pain…..that someone…….but this much? Where? Mothers of today give all their attention to their children, very much they do, studies, learning, give time…..where could mothers do this earlier?….hmmm? Now they pay full attention to their children, teaching them, their studies, where could they spend this much time earlier?

I –Okay. So, does it mean that spending time and mamta means the same thing? Meaning, if you don’t spend time that means there is something missing in your mamta?

M –There is nothing lacking in mamta. Mamta remains the same. Oh, whoever it was, small child or big child……many children there were earlier…but that does not mean the mother would show preferences. But mamta is an internal emotion. Let’s take the father, a father’s love is a love of responsibility. He is always preoccupied with studies, learning, teaching. The child has to be made to ‘become big’. Today’s mothers themselves think about these things. Earlier mothers never used to think about these things.

I – Okay, so, you are saying that mamta only gives love and a father also thinks about ‘life’? And today’s mothers have also started thinking about life?)

M – Today’s mothers think about these things. Earlier where they used to think?

I – So if you say that mamta is used for internal [deep] love, then it cannot be used with reference to the father? Can there not be a father’s mamta?)

M – Fathers also feel mamta, why not? (affirming)

I – Then why have we never heard about this?

M – Oho, the mother’s mamta thing has become proverbial like. Why can’t a father also feel mamta? (affirming). There are many fathers who take care of their children in the absence of the mother, how they care for children if the mother passes away……sacrifice their whole life to children, don’t marry again….for the sake of the children).

I – So the love that sacrifices itself for the sake of a child is mamta, whether it is the mother or father….?

M – Of course!

I – So an aunt, aunt [different kin terms, not distinguishable in English] can also express it?

M – I think it can (be expressed). If someone raises a child with a true mind, then we will call it mamta. Like in the case of adoption, doesn’t that mother show mamta? [affirming]

I – Okay (respectfully) done, thanks

Between sisters

I – Yes, Rashmiji. R – Yesji

I – I want to ask you some questions. R – Yesji, ask.

I – Have you heard the word mamta? R – Yesji, I’ve heard.

I – In your view, what does it mean?

R – Mamta, the word….mmmmm……this word mother’s mamta, that is the reference, and it’s use. And mamta means unselfish love, and it is constructed from the word for mother [ma] m-a-m-t-a…..That is why it is mostly used for the mother’s love, because a mother’s love is calm and unselfish.

I – So, are you saying that you believe that the word has derived from the word for mother?

R – Yes, this is my view.

I – So we cannot use this word with any other reference, or what?

R –No, unselfish love anyone can express, whether towards your own child or any person living with you, or an animal, that can also be like mamta if it is unselfish?

I – What do you mean by unselfish?

R – Meaning that we have no expectations from that love. That in exchange of this we will get something. Just in which the giving is more. In this the expectation of receiving is less.

I – So can we use this word mamta with reference to fathers?

R – With reference to fathers? (Pause) With reference to fathers also it can be used if the father loves in this way. Usually men and women, their nature is different. Fathers are usually duty-bound. Or………..what we say…practicalapproach towards children…and mothers’ approach is usually is full of love, teaching, learning approach more.

I – So we can use the term with reference to father’s love as well?

R – Yes if along with being practical the father is also unselfish, then sure, we can use it with reference to fathers as well. Like so many single fathers who are without spouses, they love their children just like mothers, don’t we say then they are caring for the child exactly like a mother?

I – Okay. So we say that it is ‘like a mother’s’?

R – Maybe that’s why because a mother bears a child for 9 months, and bears so much hardship for the child and stays happy with that, the largest pain she bears and without any complaints. And then when she holds the child in her lap, then her perspective is completely altered. Maybe that’s why it is considered higher and maybe that is why the word is used.

I – And….you read a lot, have you read anything about it?

R – Whenever we talk about a mother’s love, an old story or proverb comes to mind, that a mother’s love is such that if the mother is dead and buried and her child trips over her bones, she will still call out from the dead “Hope you didn’t get hurt, my child”? Such is an example of a mother’s love.

I – That is a child can give as much trouble but a mother doesn’t stop loving? Can it be in any relationship?

R – Mamta, I said earlier also, that you can feel mamta for anyone who you live with [or near], even if it an animal. But the example we take to compare this with is a mother’s love for her child. The meaning may go round and round but it rests with ‘mother and child’.

I – So if I say that the word mamta derives from ma, the word for mother, am I right?)

R – In my view, yes.

I – Okay, Ji, thank you!

 

 

6 thoughts on “Face-to-face

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  1. There is mention of mamta in the first chapter of Devi Mahatmya popularly known as Durgā Saptashatī, a Hindu religious text . The framing narrative of Devi Mahatmya presents a dispossessed king, a merchant betrayed by their family, both constantly worrying about well being of their loved ones’ & longing to reconnect with them and a sage whose teachings lead them both beyond existential suffering. The sage instructs by recounting three different epic battles between the Devi and various demonic adversaries (the three tales being governed by the three Tridevi, respectively, Mahakali (Chapter 1), Mahalakshmi (Chapters 2-4), and Mahasaraswati (Chapters 5-13). As a prelude to these tales, the sage suggest that the reason for their suffering is their attachment or mamta towards their loved ones…He tells that not just humans but even animals are trapped in this type of love. He gives example of birds that feed their own food to their children out of this love. He believes this love is Maya, an illusion created by the goddess to trap humans to material world so that they don’t seek Moksha easily. He then suggest to please the goddess to get rid of this illusion and see the self beyond the worldly & materiel. Hope this adds to many aspects of understanding mamta…

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  2. From one of our readers: “Most important aspects of being a carer are the consistency, stability and emotional responsiveness of the relationship in order to develop a sense of security in the child.

    I think the feeling that one is not loved as much or enough by a parent is from a sense of insecurity of not being enough (good, nice,smart etc.) that a child feels when siblings, other priorities that take the physical , emotional presence of the mother/parent away.
    Or when the child gets reprimanded and the sibling is not … some of these are developmental stages in children.

    As the child grows and matures he/she is able to recognize the different ways in which a mother shows her love ( as long as it is a relatively normal family life and childhood)
    Some children carry the scars of this sense of not being enough all their lives. Also children are more vulnerable to the the feelings of not being loved at certain stages .
    Almost every child has felt this at one time or another and do very well.”

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